बैठा हूँ मै सामने , एक जलते हुए दिए के | ह्रदय में उठ रहा है , बस एक ही प्रश्न ? ये दिया है या मैं ही हूँ , या है मेरा अपना ही प्रतिबिम्ब | जो जल रहा है निरंतर , कुछ कहे बिना किसी से | लपटों की लालिमा है , ह्रदय का लहू जैसे | जलती हुयी बाती , तस्वीर है विरह की | किन्तु - स्वयं को जला कर भी , ये शांत है , प्रशांत है | समेटे हुए स्वयं में , अथाह दर्द का सागर ; बिलख रहा निरंतर , ओढ़े प्रसन्नता की चादर | शायद इसी तरह से , मैं भी जल रहा हूँ ; सुकून की तलाश में , दर-दर भटक रहा हूँ सुकून की तलाश में , दर-दर भटक रहा हूँ ||
अनंत काल मिट गया , एकांत की परछाई में | जड़ नहीं चेतन नहीं , ब्रह्माण्ड की गहराई में |१| मेरी कोख में रोपित हुआ , चेतना और जीवन का बीज | सभ्यता विकसित हुयी , बने मिटे त्यौहार -तीज |२| स्वयं ही चितेरी और - मैं स्वयं चित्रकारी हूँ | देव -दानव नर नहीं , मैं आदि शक्ति नारी हूँ |३| युग सहस्त्र बीत गये , इतिहास भी तो मौन है | अमूल्य मेरा योगदान , किन्तु अस्तित्व मेरा गौण है |४| जो मजबूत गहरी जड़ नहीं , तो वट वृक्ष भी जर्जर हुआ | सशक्त नारी के बिना , समाज न उर्वर हुआ |५| सभ्यता सिरमौर हमारी , जब गार्गी मैत्रेयी अपाला | फिर सहस्त्रों वर्ष दास थे , जब नारी को पिंजरे में डाला |६| लक्ष्मी इंदिरा ऐश्वर्या कल्पना, सशक्त भारत में अवनि मोहना | प्रगति हमेशा रहे सुनिश्चित , जब सशक्त नारी हो समाज स्पंदना |७| शिक्षा दीक्षा उचित परवरिश , हर बिटिया का है अधिकार | सशक्त नारी ही आधार शिला है , देश समाज और परिवार |८| https://www.facebook.com/antarmana https://sk4sushil.blogspot.com/
है आज भी याद वो दिन मुझको , जब पहली बार तुझे देखा | गाल गुलाबी , चंचल चितवन , और अधरों की पतली रेखा || केसर मिली दूध सी रंगत , नव तरुणी की अल्हड़ काया | कमर कमानी , नजरें तिरछी , मंद - मंद मुस्कान की माया || लाल दुपट्टा चुनर पीली , रहती हरदम छैल - छबीली | ठहरे कदम पलट कर देखा , लेकिन कुछ मुँह से ना बोली || केश राशि थी निपट अमावस , धवल दंत थे सोम सरीखे | सुर्ख हिना से सजी हथेली , कोई रूप सजाना तुमसे सीखे || बहुत पुरानी बात है ये , एक लम्बा अरसा बीत गया | यादों के उन धागों से , मैं सपने बुनना सीख गया ; मैं सपने बुनना सीख गया ||
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