धीर धर तू...
हे मनुज तू धीर धर ना आंख में तू नीर धर अंधेरा कितना भी घना हो,सुबह समय से ही होगी हो घोर भयानक काली रात पर पल भर भी देरी ना होगी फिर से उषा होगी फिर नया उजाला फूटेगा नभ में लाली छाएगी तम पीछे को छूटेगा धीरे-धीरे माप बढ़ेगा फिर सूरज का ताप बढ़ेगा डूबी धरा अंधेरे में थी अब दिनकर का प्रताप बढ़ेगा जीवन होगा सकल जगत में दिग दिगंत उल्लास बढ़ेगा डूबी धरा अंधेरे में थी जब जब कालदेव का कोप हुआ व्योम शिखर से क्षितिज में डूबे रवि का पौरुष लोप हुआ ना सदा किसी की हार हुई न सदा किसी की जीत रही अनंत काल से आज दिवस तक यही जगत की रीत रही ...... हे नर तू क्यों घबराता है संघर्षों से जान बचाता है संघर्षों की घनी रात पर सूर्य विजय का उगता है कर अथक परिश्रम, अनुशासन से सागर भी सेतु से बंधता है सागर भी सेतु से बंधता है अंतरमन में तम न बसे बस ध्यान हमेशा धरना है मंजिल तो चल कर आएगी अभ्यास निरंतर करना है अभ्यास निरंतर करना है ||