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धीर धर तू...

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हे मनुज तू धीर धर ना आंख में तू नीर धर अंधेरा कितना भी घना हो,सुबह समय से ही होगी  हो घोर भयानक काली रात पर पल भर भी देरी ना होगी फिर से उषा होगी फिर नया उजाला फूटेगा नभ में लाली छाएगी तम पीछे को छूटेगा  धीरे-धीरे माप बढ़ेगा  फिर सूरज का ताप बढ़ेगा डूबी धरा अंधेरे में थी  अब दिनकर का प्रताप बढ़ेगा जीवन होगा सकल जगत में  दिग दिगंत उल्लास बढ़ेगा डूबी धरा अंधेरे में थी जब जब कालदेव का कोप हुआ व्योम शिखर से क्षितिज में डूबे रवि का पौरुष लोप हुआ ना सदा किसी की हार हुई न सदा किसी की जीत रही अनंत काल से आज दिवस तक  यही जगत की रीत रही ...... हे नर तू क्यों घबराता है  संघर्षों से जान बचाता है  संघर्षों की घनी रात पर  सूर्य विजय का उगता है कर अथक परिश्रम, अनुशासन से  सागर भी सेतु से बंधता है  सागर भी सेतु से बंधता है  अंतरमन में तम न बसे बस ध्यान हमेशा धरना है  मंजिल तो चल कर आएगी  अभ्यास निरंतर करना है  अभ्यास निरंतर करना है ||

मासूम बचपन

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face मासूम बचपन वो धुँधली सी यादें, सतरंगी सपने,वो छोटे से वादे। घर का वो आंगन, और गाँव की गलियां; वो आम के टिकोरे, मटर की वो फलियाँ। धान के खेतों में पौधे लगाना, जौ की फली से घड़ियाँ बनाना। आलू के ठप्पों से रंगीन होली, गुझिया घोड़े हाथी से सजती दीवाली। जाड़ों के दिन और गर्मी की रातें, किरकिट के किस्से और मंदिर में बातें। अमरूद के पेड़ और आम के बगीचे, अपने कंचे छुपाना उस जामुन के नीचे। वो छुपना-छुपाना, पतंगे उड़ाना, चोरी से भैया की साइकिल चलाना। छोटा सा बचपन और लम्बी कहानी, भूतों के किस्से बड़ों की जुबानी। हाथों में पाटी कन्धे पे बस्ता, चवन्नी की चूरन जमाना था सस्ता। वो गुड़ की जलेबी वो सर्कस वो मेले, हर दिल लुभाते बिसाती के ठेले। तालाब किनारे वो मछली पकड़ना, पेड़ों पे चढ़ना ,उल्टा लटकना। वो तिलवा वो ढूंढी और लडुआ की तिकड़ी, बोरी में भर-भर के आती थी खिचड़ी। हँसते-हँसाते ,सपने सजाते, सुहाने से दिन और प्यारी सी रातें। कहाँ छोड़ आया वो मासूम बचपन, वो सोने से दिल और चाँदी सी बातें।।

दिवाली की बख्शीश

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  नवंबर का महिना, शिशिर ऋतु की सुहानी सुबह |  सूर्य देव धीरे-धीरे नभ में अपना पंख पसार रहे थे , और उनकी हलकी लालिमा जब रंग बदलती हुयी धीरे से पीलेपन से प्रेम बढ़ाने लगी तभी मेरी आँख खुली | हर छुट्टी के दिन की तरह एक अलसाई सी सुबह | आम दिनों की तरह आज अदरक कूटने की आवाज पड़ोस से नही आ रही थी | शायद इसीलिए आज मैं रोज की तरह साढ़े पाँच बजे जगने के बजाय अपने आप सुबह छः बजे जगा | बिस्तर में ही पड़े हुए कुछ देर छत को निहारता रहा और शायद सहलाती हुयी सर्दी का प्यार पाने के लिए फिर से कम्बल खींचने ही वाला था की एक प्यारे शुभचिंतक ( मच्छर ) ने विचार बदलने के लिए आवश्यक साहस दिलाने का प्रयास शुरू कर दिया | और अंततः एक खालिश भारतीय शुभचिंतक की तरह उन्हें अपने सार्थक प्रयास पर आत्ममुग्ध होने का अवसर मिला और मैं आँखे मिचकाते हुए , उबासी लेते हुए उठ बैठा | कन्धों के ऊपर हाथों को खींचते हुए , जोरदार जम्हाई ली ; सर्वत्र विराजित ईश्वर को मानसिक नमन करते हुए अपना स्वयं का कमलमुख दर्शन हेतु वाशबेसिन पहुंचा | मुँह धोते ही आदतन अर्धांगिनी को आवाज लगायी , " पानी पियोगी क्या?"   ( एक आ...