बैठा हूँ मै सामने , एक जलते हुए दिए के | ह्रदय में उठ रहा है , बस एक ही प्रश्न ? ये दिया है या मैं ही हूँ , या है मेरा अपना ही प्रतिबिम्ब | जो जल रहा है निरंतर , कुछ कहे बिना किसी से | लपटों की लालिमा है , ह्रदय का लहू जैसे | जलती हुयी बाती , तस्वीर है विरह की | किन्तु - स्वयं को जला कर भी , ये शांत है , प्रशांत है | समेटे हुए स्वयं में , अथाह दर्द का सागर ; बिलख रहा निरंतर , ओढ़े प्रसन्नता की चादर | शायद इसी तरह से , मैं भी जल रहा हूँ ; सुकून की तलाश में , दर-दर भटक रहा हूँ सुकून की तलाश में , दर-दर भटक रहा हूँ ||
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